Friday, June 8, 2018

Creative Corner - Nitesh Kumar Singh


दास्ताने-इंक़लाब


कब तक दफ़न रखेगी सवालों का ज़लज़ला?
कब तक घोंटती रहेगी अरमानों का गला?
गया है अब वक़्त, तेरे फ़िरदौस में गुलों के खिलने का,
गया है अब वक़्त, जब आएगा खुशियों का सैलाब!

ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!

कब तक इज़्तिरार पे अश्क़ बहाती रहेगी?
कब तक इज़्तिराब में खुद को जलाती रहेगी?
गया है अब वक़्त, तेरा मुक़द्दर बदलने का,
गया है अब वक़्त, लेने का जिल्लतो का हिसाब!

ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!


कब तक मूरते-परस्तिश हो भी लूटती रहेगी?
कब तक बिखर-बिखर के यूँ जुटती रहेगी?
गया है अब वक़्त, तेरा तोड़ने का ख़ामोशी,
गया है अब वक़्त, देने का दुनिया को जवाब!

ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!


कब तक रूह को रखेगी क़ैद, रस्मों के ज़ंजीरों मे?
कब तक खोज़ रहेगी शख़्सियत की आईनों में, तस्वीरों में?
गया है अब वक़्त, तोड़ने का बेफ़िज़ूल दस्तूरों को,
गया है अब वक़्त, करने का चेहरों को बेनक़ाब!

ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!


इंक़लाब- Revolution
ज़लज़ला- Earthquake
फ़िरदौस- Paradise
सैलाब- Flood
ज़ेहन- Mind
इज़्तिरार- Helplessness
इज़्तिराब- Restlessness
ज़िल्लत- Humiliation

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