Thursday, September 24, 2015





नितेश कुमार सिंह


          प्रकृति-वैभव


  ऊपर आँगन नीचे बादल        

  सूरज कंदुक बन आता है

  सोना-सोना, चाँदी-चाँदी

  अनमोल भुवन मुस्काता है



  क्षण में पर्वत का धुआँ-धुआँ

  सब कुछ धूमिल हो जाता है

  विभावरी की साया में

  सारा जाग तब सो जाता है;

  ले स्वेत पत्र पर हरित संदेश

  अखिलज्ञ नभ में आता है

  'प्रकृति-वैभव' के सानिध्य

  पल में तम मिट जाता है! 




  















  ऊपर आँगन नीचे बादल   

  सूरज कंदुक बन आता है

  सोना-सोना, चाँदी-चाँदी   

  अनमोल भुवन मुस्काता है



  निर्दोष नमन का सूनापन

  कुछ और कहाँ टिक पाता है

  पर्वत के आँख-मिचौली का

  यह जाल सिमटता जाता है



  दीप-दीप सूरज उज्ज्वल कंचन

  सूरज कंदुक बन आता है

  सोना-सोना, चाँदी-चाँदी

  अनमोल भुवन मुस्काता है!



  अपने अहंकार के ऐंठन में      

  मानव तू एक अकिंचन है;

  तेरी थर्राती लघुता में

  यह देख महा-उत्सर्जन है!