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| नितेश कुमार सिंह |
प्रकृति-वैभव
ऊपर आँगन नीचे बादल
सूरज कंदुक बन आता है
सोना-सोना, चाँदी-चाँदी
अनमोल भुवन मुस्काता है
क्षण में पर्वत का
धुआँ-धुआँ
सब कुछ धूमिल हो जाता
है
विभावरी की साया में
सारा जाग तब सो जाता
है;
ले स्वेत पत्र पर हरित
संदेश
अखिलज्ञ नभ में आता है
'प्रकृति-वैभव' के
सानिध्य
पल में तम मिट जाता है!
ऊपर आँगन नीचे बादल
सूरज कंदुक बन आता है
सोना-सोना, चाँदी-चाँदी
अनमोल भुवन मुस्काता है
निर्दोष नमन का सूनापन
कुछ और कहाँ टिक पाता है
पर्वत के आँख-मिचौली का
यह जाल सिमटता जाता है
दीप-दीप सूरज उज्ज्वल
कंचन
सूरज कंदुक बन आता है
सोना-सोना, चाँदी-चाँदी
अनमोल भुवन मुस्काता
है!
अपने अहंकार के ऐंठन
में
मानव तू एक अकिंचन है;
तेरी थर्राती लघुता में
यह देख महा-उत्सर्जन
है!



6 comments:
Very nice poem, Nitesh
Very nice poem, Nitesh
Very nice poem, Nitesh
Bahut khub
Thank you very much! :)
Shukriya Bhai Ji! :)
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