दास्ताने-इंक़लाब
कब तक दफ़न रखेगी सवालों का ज़लज़ला?
कब तक घोंटती रहेगी अरमानों का गला?
आ गया है अब वक़्त, तेरे फ़िरदौस में गुलों के खिलने का,
आ गया है अब वक़्त, जब आएगा खुशियों का सैलाब!
ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!
कब तक इज़्तिरार पे अश्क़ बहाती रहेगी?
कब तक इज़्तिराब में खुद को जलाती रहेगी?
आ गया है अब वक़्त, तेरा मुक़द्दर बदलने का,
आ गया है अब वक़्त, लेने का जिल्लतो का हिसाब!
ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!
कब तक मूरते-परस्तिश हो भी लूटती रहेगी?
कब तक बिखर-बिखर के यूँ जुटती रहेगी?
आ गया है अब वक़्त, तेरा तोड़ने का ख़ामोशी,
आ गया है अब वक़्त, देने का दुनिया को जवाब!
ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!
कब तक रूह को रखेगी क़ैद, रस्मों के ज़ंजीरों मे?
कब तक खोज़ रहेगी शख़्सियत की आईनों में, तस्वीरों में?
आ गया है अब वक़्त, तोड़ने का बेफ़िज़ूल दस्तूरों को,
आ गया है अब वक़्त, करने का चेहरों को बेनक़ाब!
ज़ेहन में जो तूफान है, उसपे मत लगा तू बंदिश,
कोरे-काग़ज़ पे, रोशनाई से बिखेर दे, दास्ताने-इंक़लाब!
इंक़लाब-
Revolution
ज़लज़ला-
Earthquake
फ़िरदौस-
Paradise
सैलाब-
Flood
ज़ेहन- Mind
इज़्तिरार-
Helplessness
इज़्तिराब-
Restlessness
ज़िल्लत-
Humiliation













